Wednesday, 2 August 2017

कविता - मेरे अहसासों के मोती

कविता - मेरे अहसासों के मोती

हम तो बस प्रयास कर रहे हैं
कि शब्दों की माला में
पिरो पाएं अपने अहसासों के मोती
जाने उन्हें ऐसा क्यों लगता है
कि हम कवि हो गए हैं

हम तो प्रयासरत थे कि
जीवन की खट्टी-मीठी अनुभूतियों को 
उतार पाएं कागज़ के टुकड़े पे
जाने उन्हें ऐसा क्यों लगता है
कि हम कवि हो गए हैं

हम तो चाहते थे कि
कुछ सामाजिक कुरीतियों को
उजागर कर पाएं किसी तरीके से
जाने उन्हें ऐसा क्यों लगता है
कि हम कवि हो गए हैं

हम तो कर रहे हैं बात भाईचारे की
ताकि इंसानियत ज़िंदा रह सके
कुछ तुझमे भी, कुछ मुझमे भी
जाने उन्हें ऐसा क्यों लगता है
कि हम कवि हो गए हैं

- स्वर्ण दीप बोगल

Sunday, 30 July 2017

कविता - मेरी व्यथा

कविता - मेरी व्यथा

देवराज इंद्र के कपट की,
थी शिकार मैं फिर भी,
महर्षि कपिल द्वारा अभिशप्त,
मैं ही क्यों पाषाण हुई। 
हाँ, अहिल्या ही थी तब मैं

रावण की कैद से अधिक,
पीड़ादायक अग्निपरीक्षा देकर भी,
बस एक उलाहने पर ही,
क्यों मैं ठुकराई गई। 
हाँ, सीता ही थी तब मैं

क्या उम्मीद गैरों से रखती,
दुश्शासन को मैं दोष क्या देती,
जब धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा ही,
सम्पत्ति जैसी मैं जुए में हारी गई। 
हाँ, द्रौपदी ही थी तब मैं

भिन्न कालों के शाही पुरुषों का,
क्या-क्या मैं बखान करूं,
अन्तःपुरा हो या हरम कोई,
बन्द पर्दों में ही मैं छुपाई गई। 
हाँ, शाही परिवार से ही थी मैं

कहीं जन्म लेते ही मृत्यु पाती,
मृत पति संग सती की जाती,
अरमानों का गला घोंटकर,
सब कुछ बस सहती ही जाती। 
यही है इतिहास मेरा,
हाँ, एक स्त्री ही थी मैं

- स्वर्ण दीप बोगल 

Saturday, 29 July 2017

कविता - घर की इज़्ज़त

कविता - घर की इज़्ज़त

जब मुड़कर पीछे मैंने देखा
कि क्या पाया क्या खोया हमने
तो जाना कि बदलती परिस्थितियों में ,
जीवन जीने का तरीका बदला
इस पितृसत्तात्मक समाज का
हर रंग-रूप व ताना-बाना बदला
कुछ हालात मेरे भी बदले
पिंजड़ा भी कुछ कुछ तोड़ पायी मैं

फिर भी कुछ बातें मेरे प्रति
अभी तक प्रचलन में हैं
प्रतक्ष्य नहीं तो किताबों में सही
देवी मैं आज भी मानी जाती हूँ
आज भी हर घर समाज की मैं
इज़्ज़त ही मानी जाती हूँ
जिसे तार-तार करने में 
विरोधी विजय समझते  हैं

ये कैसी इज़्ज़त मेरी है
अब तक मैं समझ न पाती हूँ
जो बेजान सम्पत्ति जैसी
छुपाई व संभाली जाती हूँ
बहुत हुआ अब सहते सहते
अब इतना तो अहसान करो
न वस्तु हूँ और न कोई देवी
बस मनुष्यों सा व्यवहार करो

-स्वर्ण दीप बोगल

Wednesday, 26 July 2017

कविता - लाचार बचपन

कविता - लाचार बचपन

बेमानी सी लगती है मुझे,
चहुँ ओर फैली चकाचौंध,
विकास के नाम पर बनती
बड़ी-२ गगनचुंबी इमारतें,
व विशाल शॉपिंग मॉल्स,
जब मासूम बच्चों को नालियों में,
कूड़ा बीनते हुए देखता हूँ।

वैसे तो लगता है कि
करली तरक्की हमने बहुत,
महंगे होटलों में जब जाते हैं,
दावतें जब हम उड़ाते हैं,
मगर सिहर उठता हूँ अंदर तक मैं,
जब मासूम बच्चों को कूड़ेदानों से,
बचा-खुचा खाना चुनते देखता हूँ।

विकास के नाम पर की गई,
हर बात तब मुझे निरर्थक लगती है,
जब इस महान राष्ट्र के भविष्य को,
मासूम अबोध बालकों को, 
एक एक दाने के लिए,
अपने लिए और अपने परिवार के लिए,
मैं इतना लाचार देखता हूँ

कैसे मानूं कि तरक्की करली बहुत,
जब तक एक भी मासूम बचपन मजबूर है,
नालियों से कूड़ा चुनने को,
विद्यालयों में पढ़ाई करने के स्थान पर,
मेहनत मशक्कत व मज़दूरी करने को,
भूखे पेट की आग बुझाने के लिए,
दर-दर ठोकरें खाने को।।

- स्वर्ण दीप बोगल

Thursday, 20 July 2017

कविता - युवा शक्ति

कविता - युवा शक्ति

वर्षों से सुनता आया हूँ
कि विश्वशक्ति बनेगा भारत
क्योंकि सबसे विशाल
युवा जनसमूह का देश है यह
मगर बस कहने भर से
कैसे ये हो पायेगा
जब देश का पढ़ा लिखा युवा
एक एक नौकरी के लिए
हज़ारों की भीड़ में धक्के खायेगा

सरकारी क्षेत्र की क्या बात करें
निजी क्षेत्र का भी बुरा हाल है
कम नौकरियों के चलते फैला
वहां भी अब भाई भतीजावाद है
फौज खड़ी है युवा बेरोजगारों की
अपनी शारीरिक व मानसिक
कुशलता बाज़ार में बेचने को
मगर योग्य को भी काम मिलना
अब यहाँ कौन सा आसान है

युवाओं का तो अब बुरा हाल है
क्योंकि पिता द्वारा लिया गया
शिक्षा पर ऋण भी तो याद है
किसी भी तरह काम मिले यही आस है
टूटती आस युवाओं की
क्या क्या कहर ढा रही है
कहीं नशों में, कहीं अवसाद में,
तो जुर्म की दलदल में
गहरा उनको धंसा रही है

मगर कैसे विश्वशक्ति बनेगा भारत
जब सक्षम युवा विदेशों में
काम करने को मजबूर है
जब सरकारों के पास योजनाएं तो हैं
मगर ज़मीनी हक़ीक़त में
काम के अवसर ही नहीं
मिल पा रहे या तलाशे जा रहे हैं
जब संसाधन नहीं युवा जनसमूह के लिए,
काम के लिये, जीवन यापन करने के लिये

- स्वर्ण दीप बोगल

Tuesday, 18 July 2017

कविता - मज़दूर

कविता - मज़दूर का दिन 

सुखा पसीना कल का, 
आधे अधूरे पेट से, 
मैं निकल पड़ा हूँ आज, 
फिर मज़दूरी बेचने।

परवाह न मुझे, 
ठिठुराती सर्दी की 
न ही मुझको, 
झुलसाती गर्मी की

डरूं मगर मैं, 
बेरहम बारिश से 
कि कहीं दिहाड़ी 
टूट न जाए 

मेरे बच्चों को 
मिलने वाली 
रोटी का सपना भी 
कहीं टूट न जाए

रोज़ कमाता हूँ 
मैं रोज़ खाता हूँ 
बचा के रखने के लायक 
कहाँ कमा पाता हूँ 

खून पसीना बहाता हूँ 
बदले में क्या पाता हूँ 
फिर भी मालिकों, ठेकेदारों की 
झिड़कें मैं खाता हूँ 

उनकी उम्मीद पर 
खरा कैसे उतरूं मैं मज़दूर हूँ 
कल फिर बेचने को 
मज़दूरी कुछ बचाता हूँ 


- स्वर्ण दीप बोगल 

Sunday, 16 July 2017

ख़ुफ़िया मिशन

मैने सुना ज़िंदगी हो जाती है आसान,
दुख सुख बांटने से एक दूसरे से।
फिर भी न जाने कुछ लोग
ज़िन्दगी को अपनी जीते हैं ऐसे,
ख़ुफ़िया मिशन कोई चल रहा हो जैसे।।